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हाथरस। सनातन पक्ष की देवशयनी एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर चार माह के लिए योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं, जिसके साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है। श्री सिद्ध गोपाल सेवा ट्रस्ट समिति के संस्थापक एवं अध्यक्ष पंडित सुरेंद्र नाथ चतुर्वेदी ने यह जानकारी देते हुए बताया कि यह अवधि साधना, संयम, जप-तप और भक्ति के लिए सर्वोत्तम मानी गई है।

पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 24 जुलाई 2026 को सुबह 9:12 बजे प्रारंभ होगी और 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई (शनिवार) को रखा जाएगा, जबकि व्रत का पारण द्वादशी तिथि में नियमानुसार किया जाएगा। पंडित सुरेंद्र नाथ चतुर्वेदी ने बताया कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने से पापों का क्षय होता है तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। पूजा विधि में भगवान विष्णु का जल, गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक कर पीला चंदन, पीले पुष्प, तुलसी दल, फल और नारियल अर्पित किए जाते हैं। घी का दीपक जलाकर आरती करने तथा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करने का विशेष महत्व है।

उन्होंने बताया कि देवशयनी एकादशी से चातुर्मास का आरंभ होता है, जो सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास तक चलता है। इस चार माह की अवधि में दान, जप, तप, व्रत, सत्संग और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व माना गया है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागृत होते हैं और चातुर्मास का समापन होता है। पंडित सुरेंद्र नाथ चतुर्वेदी ने श्रद्धालुओं से देवशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धा एवं विधि-विधान से करने का आह्वान करते हुए कहा कि यह पर्व केवल व्रत नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का पावन अवसर है।

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